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‘परिवर्तन संसार का नियम है I’ सम्पूर्ण सृष्टि का यह आधारभूत सिद्धांत है I कुछ समय के अंतराल में ही बहुतायत बदलाव हमें देखने को मिलते हैं I यही बदलाव हमें जीवन जीने की कला सिखाते हैं, जो व्यक्ति को परिपक्वता की ओर अग्रसर करते हैं तथा कठिन परिस्थितियों में धैर्य न खोने की प्रेरणा भी देते हैं I सकारात्मक परिवर्तन हमारे जीवन को उन्नत दिशा की ओर ले जाता है, जिस प्रकार अन्धकार के बाद प्रकाश के आगमन से सम्पूर्ण जगत ज्योतिर्मय हो जाता है, उसी तरह कठिन डगर पर चलकर ही परिवर्तन के साथ अपने लक्ष्य की प्राप्ति होती है I आज यह कोरोना-काल भी हमारे जीवन-काल में आने वाली एक बाधा ही है, परन्तु सकारात्मक सोच तथा उचित दिशा-निर्देशों से हम इस कठिन काल पर भी विजय प्राप्त कर सकेंगे I हो सकता है कि यह कोरोना काल हमारे लिए एक परीक्षा हो, जिससे हम आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में एक कदम और बड़ा सके I इस महामारी के काल में भी हमने सभी क्षेत्रों में सजगता से कार्य करते हुए कई नयी-नयी चीजें सीखी हैं I इस परिवर्तन काल में हम स्वदेशी वस्तुओं को अपनाते हुए अपने देश की अर्थव्यवस्था में सहयोग करेंगे I
जैसा कि सर्वविदित है कि अगर परिवर्तन नहीं होता या कठिनाइयाँ नहीं आती तो क्या हम आज इतने सक्षम हो पाते ? संघर्ष ही सफलता का सोपान है, जो परिवर्तनानुसार हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता हैं I इस कोरोना काल ने भी हम सभी को कई क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बनने के लिए तैयार किया हैं, चाहें वह कृषि, उद्योग, तकनीकि, सैन्य शक्ति, निर्माण, चिकित्सा और अंतरिक्ष क्षेत्र ही क्यों न हो I
आने वाले समय में भी हम सकारात्मक सोच को स्वीकारते हुए अपने अपने शैक्षिक परिवेश को अधिक सुगम व प्रभावी शिक्षण विधियों से संपन्न करते हुए नवभारत का निर्माण करने में सफल होंगे I
वह पथ क्या पथिक कुशलता क्या, जहाँ बिखरे काँटों के शूल न हों I
वह नाविक धैर्य कुशलता क्या, जहाँ धाराएँ प्रतिकूल न हों II
-अनिल कुमार शर्मा, विभागाध्यक्ष, हिंदी
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