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संस्कृत भारतीय संस्कृति की प्राणस्वरूपा; भारतीय धर्म-दर्शन आदि का प्रसार करने वाली; विश्व की सभी भाषाओं में प्राचीनतम तथा सर्वमान्य रूप में ग्रहण की गई है। सम्पूर्ण वैदिक-वाङ्मय, रामायण, महाभारत, पुराण, स्मृतिग्रन्थ, दर्शन, धर्मग्रन्थ, महाकाव्य, काव्य, नाटक, गद्यकाव्य, गीतिकाव्य, व्याकरण तथा ज्योतिष संस्कृत भाषा में ही उपलब्ध होकर इसके गौरव को बढाते हैं, जो भारतीय सभ्यता, भारतीय संस्कृति और भारतीय धरोहर की रक्षा करने में पूर्णतः सहायक है। संस्कृत से सुसंस्कृत समाज का निर्माण होता है, जैसे- वैदिक संस्कृति में गर्भ से पंचतत्व विलय पर्यन्त षोडश संस्कार का विधान है। संस्कार से शरीर और मन पवित्र होता है; पर्यावरण शुद्ध होता है। संस्कारों का वैज्ञानिक महत्त्व भी है। जिस प्रकार उदर के लिए भोजन की आवश्यकता होती है; उसी प्रकार नैतिक मूल्यों से ही मानव अपनी सभ्यता का परिचय देता है। संस्कृत साहित्य में ऐसे सुभाषितों की भरमार है; जो मनुष्य की सभी समस्याओं का समाधान करते हैं; जैसे-
मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्टवत्।
आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः ।।
उपर्युक्त शास्त्रीय और आधुनिक रूप से संस्कृत के महत्त्व को स्वीकार करते हुए ‘नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020’ में भी बहुभाषावाद को प्रासंगिक बताते हुए शिक्षाक्षेत्र के सभी स्तरों पर संस्कृत को जीवन जीने की मुख्य धारा में शामिल कर अपनाने पर बल दिया गया है। अतः संस्कृत का अध्ययन कर के छात्र-छात्राएं न केवल अपने-अपने अतीत से गौरवान्वित होकर वर्तमान में संतुलित व्यवहारशील की ओर अग्रसर होंगे; अपितु भविष्य के प्रति भी उल्लासित होंगे।
इस भाषा की वैज्ञानिकता का अध्ययन करके ही अनुसंधान संस्था नासा ने 1987 ई. में ही संस्कृत को कंप्यूटर के लिए सर्वोत्तम भाषा घोषित कर दिया था, जिस कारण आज उस संस्था के द्वारा संस्कृत में सतत शोध किए जा रहे हैं। पाश्चात्य भाषा वैज्ञानिकों ने पाणिनि-व्याकरण को मानवीय-बुद्धिमत्ता की सर्वोत्कृष्ट रचना कहा है। आज भी अमेरिका, जर्मनी आदि अनेक देश संस्कृत के क्षेत्र में सतत उत्कृष्ट अनुसंधान कार्य करके इसकी श्रीवृद्धि में प्रयत्नशील है। अमेरिका की सबसे बड़ी संस्था नासा (National Aeronautics Space Administration) ने संस्कृत भाषा को अंतरिक्ष में कोई भी मैसेज भेजने के लिए सबसे उपयोगी दावा माना है; क्योंकि संस्कृत के वाक्य उल्टे हो जाने पर भी अपना अर्थ नहीं बदलते है। दुनिया की 97 प्रतिशत भाषाएँ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से संस्कृत से प्रभावित हैं। यह अकेली ऐसी भाषा है जिसे बोलने में जीभ की सभी संवेदिकाओं का इस्तेमाल होता है। अमेरिकन हिंदू यूनिवर्सिटी के मुताबिक संस्कृत बोलने से शरीर में ऊर्जा का संचार होता है और रक्त का प्रवाह बेहतर होता है। नासा की एक रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका छठी और सातवीं पीढ़ी के ऐसे सुपर कंप्यूटर तैयार कर रहा है, जो संस्कृत पर आधारित होंगे। संस्कृत की पांडुलिपियों पर शोध के लिए नासा में अलग से एक डिपार्टमेंट बनाया गया है। नासा के पास ऐसी 60 हजार से ज्यादा पांडुलिपियां हैं। वहीं लंदन के जेम्स जूनियर स्कूल में सभी छात्रों के लिए संस्कृत की पढ़ाई अनिवार्य है। कनाडा में पहली से आठवीं तक संस्कृत भाषा की शिक्षा दी जा रही है । बोलचाल की भाषा में संस्कृत भारत के संविधान में आठवीं अनुसूची में शामिल है; जबकि उत्तराखंड राज्य में इसे दूसरी राजकीय भाषा का दर्जा हासिल है। इसके अलावा देश के कई हिस्सों में इसे सामान्य बोलचाल की भाषा के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। कर्नाटक के मुत्तूर, मध्यप्रदेश में नरसिंहपुर जिले के मोहाद और राजगढ़ जिले के झिरि, राजस्थान के बूंदी जिले के कापेरान, बांसवाड़ा जिले के खाडा और गनोड़ा, उत्तरप्रदेश के बागपत में बावली और ओडिशा के श्यामसुंदरपुर गांव में संस्कृत बोलचाल की भाषा है।
संस्कृत में इतनी वैज्ञानिकता होने के कारण ही अमेरिका, रूस, स्वीडन,कनाड़ा, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, आस्ट्रिया देशों में नर्सरी से ही बच्चों को संस्कृत पढ़ाई जाने लगी है। कहीं ऐसा न हो कि हमारी संस्कृत कल वैश्विक भाषा बन जाए और हम संस्कृत को तुच्छ या मृत भाषा का दर्जा देकर उस पर केवल थोड़े और भद्दे मसखरों की भाषा समझते रहे। आने वाले समय में संस्कृत कंप्यूटर की भाषा बनने जा रही है। अतः अंग्रेजी भाषा के साथ-साथ अपने बच्चों को संस्कृत का ज्ञान अवश्य दिलाएं । संस्कृत का उपहास करके हम अपनी जननी, अपनी सभ्यता और संस्कृति का उपहास नहीं करें।
-डॉ. राम बाबू शर्मा, विभागाध्यक्ष (संस्कृत)
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